चाल्या क्यॉं तमे?

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दूरी

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मज़हब

राम -रहीम का नाम लेते ही हर चहेरे पे नूर हो जाए
मज़हब की दूरियाँ कायम के लिए यूँ ही दूर हो जाए

गिर जाए फिरका परस्ती की दिवारें और फैले भाईचारा
तो दुनिया में मेरा हिंदोस्तान सब से मकदूर हो जाए

हल हो जाए जहाँ के हर मसले और थम जाए लडाई
इन्सानियत ही दीन का पैगाम है बात ये मशहूर हो जाए

हो सकता है चैनो अमन और खुशहाल देश का कोना कोना
सियासत में बैठें हैं जो गीधड सारें के सारें विदूर हो जाए

सारा जहाँ भी जन्नत जैसा दिखने लगेगा “कमल” सब को
यदि दिलों में नफरत की जगह मोहब्बत भरपूर हो जाए

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नियाज

मिलती नहीं तेरी नियत तेरे कारनामों से, आगाज़ बदल
अल्फाजों और किरदार का मेल ही नहीं हैं आवाज़ बदल

नहीं पहुँच रहे है सूर, बार बार दोहरा के भी रूह तक
कुछ तो कमी होगी तेरी तालीम में थोडा रियाज बदल

जरुरत नहीं मैं पुकारुँ तभी तू ही मेरी मदद के  लिए आए
मिल सकूँ अपनी मर्जी से जन्नत में, जरा रिवाज़ बदल

कोई ना कोई हुनर तो बख्शता है रब सब को रोजी रोटी के लिए
मायूस हो के हौंसला न हार, कामयाबी के लिए कोशिश कर, अंदाज़ बदल

मिलता ही है मेरा मौला “कमल” सब को, इमान की ईबादत से
तुझे भी रूबरू होगा एक ना एक दिन जरूर, बस नियाज बदल

© कमलेश रविशंकर रावल

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URI

हम #URI देख के खुशीयाँ मनाते रहे,
वो #CRPF पे हमला करने का #plan बनाते रहे,

हम #surgical #strike का गाना बजाते रहे
वो #शहीदों की लाशों पे #दुश्मन को नचाते रहे

हम #PDP के संग कश्मीर में अपनी सरकार बचाते रहे
वो हम को ही हमारी #सियासत की जाल में फँसाते रहे

हम #terrorism को खत्म करने का खयाली पुलाव पकाते रहे
वो #कुत्ते हमारे #soldiers को पत्थर से भगाते रहे

हम #Rafaeldeal पे मुल्क में बहस चलाते रहे
वो रास्तों पे हमला करने के लिए #जैश को आगे बढ़ाते रहे

हम “अब की बार 400 के पार” के #ख्वाब सजाते रहे
वो हमारे #शहीदों के लिए नए-नए #ताबूत मंगाते रहे

हम #nawaz की नातिन की शादी में बिन बुलाए जाते रहे
आखिर हम हमारे #सपूतों की मैयत पे #रूदाली के गीत गाते रहे

© कमलेश रविशंकर रावल

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आबरु

तुम कोई मोहब्बत के फरिश्ते नहीं,
इंसान हो, नबी जितने खुदा से रिश्ते नहीं

करना है प्यार तो ताउम्र रूह और दिल से करो,
मूझे तो पूरी रकम ही पसंद हैं, किश्तें नहीं

वादा वही करता हुँ जिसे अंजाम तक पहुँचा सकुँ,
हकीकत में काम ही पसंद हैं, सुनने वाले किस्से नहीं

इश्क़ मिजाजी तबियत से जज़्बात को ना बहलाओ,
दिल किसी एक को ही दिया कर, अलग-अलग हिस्से नहीं

सोच लिया करो किसी की इज्ज़त से खेलने से पहले
आबरु आबरु ही होती है उस की कोई अलग किस्में नहीं

© कमलेश रविशंकर रावल

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कहीं और कर

छोड़ तेरी छंद की सूफियाना बातों को जज़्बात पे गौर कर,
मिल ले गले, अना छोड के वरना मुलाकात कहीं और कर

पाक है दामन मेरा, नहीं फंसा पाओगे इल्जाम लगा के,
करनी है गुनाह की छानबीन, तो तहकीकात कहीं और कर

जानता हूँ मै अपने खुदा को और वो भी अनजान नहीं,
नहीं चाहिए कोई बिचौलिया तेरे तरीकात कहीं और कर

अमन पसंदों का मुल्क है ये, नहीं चलेगी यहाँ हिटलरशाही
चाहिए यदि सिर्फ खूनखराबा तो जा, खुराफात कहीं और कर

लाख उकसाओगे, परेशाँ करोगे तब भी हम ना भडकेंगे अब,
बुझा दी है नफ़रत की आग, दुश्मनी की वसूलात कहीं और कर

कामयाब नहीं होता पहले ही मुकाबले में हर कोई
नाकामयाबी देख, हौंसला न हार, शुरुआत कहीं और कर

नहीं पढ पाएँगे, तेरे दिल की बातों को उस्ताद लोग यहाँ,
छोड़ चल गुंगो की महफिल, गजल की रजूआत कहीं और कर

© कमलेश रविशंकर रावल

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गठरी

ख़्वाहिश है इतनी कि जिंदगी मेरी वतन के काम आए,
और मरूँ तब माँ भारती तेरा तिरंगा कफन के काम आए

जान की आहुतियाँ तो देते हैं बहुत अपने मक़सद के लिए,
नमन उन्हें करता है जग, जो मानवता के हवन के काम आए

हाँसिल कर लिया है बहुत मान मरतबा और इल्काब,
वो रुतबा का क्या फायदा जो केवल दमन के काम आए

माना कि हैं हुनर तुम में हजारों दिये जलाने का,
तबियत ऐसी भी बनाओ जो आग के शमन के काम आए

ऐसा भी नहीं कि लावारिस ही था वो शख्स जिंदगी में,
पर रिश्तेदार सारे, सिर्फ उस के दफन के काम आए

सलाम नहीं करता हिटलर की दरिंदगी को कोई जहाँ में
याद करते हैं उन को जो इन्सानियत और अमन के काम आए

कमा लिया है “कमल” तुमने भी बहुत ऐश-आराम के लिए
बाँध लेना नेकी की गठरी, जो आखिरी गमन के काम आए

© कमलेश रविशंकर रावल

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