चाल्या क्यॉं तमे?

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हबीब

चंद पल में ही हमें वो हबीब लगने लगे,
दूर हैं मिलों पर दिल के करीब लगने लगे,

जानता नहीं था जिन्हें पल भर पहले,
घड़ी दो घड़ी में खुशनसीब लगने लगे

कल तक साथ रहते थे सुख में साये की तरह,
आज कसौटी के मौके पे रकीब लगने लगे

रोज मिलते थे गले और देता था जिन्हें कंधा,
उन्हें क्यूं अचानक हम सलीब लगने लगे

हो रहा था औरों को दर्द जिन का नाम सुनते ही,
मुझे तो छूते ही करिश्माई तबीब लगने लगे

© कमलेश रविशंकर रावल

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इजहार

आ के पास मेरे मुझ में समा जा ,
पा के मुझे, खुद को खुद में बसा जा

ख्वाबों में तो इजहार रोज़ कर जाते हो,
सामने आ के तो कभी मोहब्बत जता जा

वैसे तो लिखता है बहुत मेरे लिए,
एक बार शायरी मेरे कानों को बता जा

चुरा के वस्त्र गोपीयों को सताया था बहुत,
नटखट एकबार मुझ बावरी को भी सता जा

उछल रही है जोगन जोबन में मदमस्त हो के,
रातभर ले के अपनी बांहों में मुझे तू थका जा

तरसती हूं तेरे अधरों के पान करने को,
प्यास बुझाने मेरी, तेरे प्रेम का प्याला थमा जा

बहा रही है आंसू तेरे विरह में ओ कान्हा,
झलक दिखला के प्रेम दीवानी को हसा जा ,

मोहमाया के बादल में नज़र नहीं आ रहा सच
चमका के ज्ञान की बिजली अंधकार को हटा जा

© कमलेश रविशंकर रावल

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तकरार

गुफ्तगु उन से करने कमल मेरा दिल भी बेकरार है,
जानना चाहता है वो भी रुहानी रिश्तों में आई क्यूँ दरार है

गए हो जब से तूम, तब से  खोया है चैन और निंद,
रूह को इबादत के बाद भी ना मिलता कोई करार है

आ गया है पतझड़ बाग ए बहार के मौसम में,
सुकून भी आशियाने में लंबे अरसों से फरार है

टूटती नहीं सारस की जोड़ी कोई बातोबातों में यूँ ही
इस के पीछे जरूर कोई ना कोई साजिश या असरार है

दूर जा रहा है इंसान, तरक्की की दौड में इंन्सानियत से
बडे बनने की होड में दुनिया जहाँ में आपस में तकरार है

© कमलेश रविशंकर रावल

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मुलाकात

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जनगण

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समस्या

कोशिश कर, जहन से सारा छल निकलेगा,
कर ले दुआ दिल से, समस्या का हल निकलेगा

देख मुश्किल हौंसला ना हार मेरे साथी,
समाधान आज नहीं तो जरुर कल निकलेगा

पुकार ले रब को, माँग ले उस की पनाह,
कबूल कर लेगा गुनाह उसी पल निकलेगा

कर ले खेती तू इबादत की ये जनम सुधारने,
रूह से तेरे कभी ना कभी सुकूँ का फल निकलेगा

मिल जाएगी  मनचाही मंज़िल तुझे “कमल”,
बांध के कफन जब इमाँ की राह पे चल निकलेगा

© कमलेश रविशंकर रावल

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जडीबूटी

एक भोली -सी उदासी, एक उजली – सी हंसी है,
जिंदगी उम्मीद ओर हकीकत के पहियों के बीच फँसी है

मालिक ने तो बनाया था जमीं को भी जन्नत जैसा,
इस जन्नत को इंसानों की लालच की बला ही डंसी है

महामारी ने छोड़ा नहीं है ताकतवर, अमीर या गरीब को,
चारों और फैला मातम हाहाकार, लाचारी और बे-बसी है

कर रहा था कोशिश कुदरत को भी अपने काबू में करने की
उपरवाले ने बहुत सोच के ही आदमी की लगाम कसी है

मार रहे हैं सब हाथ पैर, कम करने कोरोना का कहेर,
मानवजात को बचाने की जडीबूटी कौन जाने कहाँ पे बसी है

© कमलेश रविशंकर रावल

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स्वस्थ भारत

अब तो बाहर और भीतर से लडाई लडनी है,
दुश्मन के दाँत खट्टे करने सीधी चढाई चढ़नी है,

कोरोना के संक्रमण को रोकना है हर हाल में,
मुँह पट्टी पहन, बार-बार हमें हाथ की सफाई करनी है

रोजबरोज के व्यवहार में बनाई रखनी है हमें दूरियाँ,
भीड़ ना होने दे कहीं भी, देश की भलाई करनी है

दूर रह के ही बातचीत करें, गले मिलने से डरें,
बेमतलब की आवाजाही पे संपूर्ण मनाई करनी है

लक्ष्य है हमारा स्वस्थ भारत, विश्व कल्याण हमारी चाहत,
दे के सारी दुनिया को महामारी से राहत, बधाई करनी है

© कमलेश रविशंकर रावल

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महामारी

पहले खलती थी दूरियाँ , अब नजदीकियाँ खल रही है,
कल सुबह कैसी आएगी खबर? फिक्र में शाम ढल रही है

काबू में करना चाहता था जो कायनात को कैद है घरों में,
चारों और दहशत और मौत की हवा जोर से चल रही है,

तड़प रहे हैं भूखे, लाचार -बेसहारे रोजी-रोटी की तलाश में,
कोई हो रहा है दफन दुश्मन के साथ कब्र में, लाशें साथ-साथ जल रही हैं

भटक गया इंसान इंसानियत की राह से तरक्की की दौड़ में,
उस की करनी की फसल अब महामारी बन फल रही है

नहीं छोड़ी है कुछ फरिश्तों ने नेकी और रहमत की राह,
मरीजों के दिलों में जीने की उम्मीद उन्हें देख पल रही है

© कमलेश रविशंकर रावल

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राग

कल जहाँ बाग था आज वहाँ आग है,
चारों तरफ बस अब नफ़रत का राग है

धो लिया प्रायश्चित से फिर भी जाता नहीं
ना जाने आबरु पे कैसा ये दाग है

दूर से ही ख़ैरियत पूछ, गले ना मिल
कोरोना आस्तीन में छिपा हुआ नाग है

खुश ना हो रंगबिरंगी बुलबुलों को देख,
दो पल का ही मेहमान ये झाग है

फिजा़ में बह रही है अब ताज़ा हवाएँ ,
खुशहाल अब तो हर कोयलिया और काग है

© कमलेश रविशंकर रावल

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