चाल्या क्यॉं तमे?

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मछली

मैं बहता पानी और वो खूब खेलती मछली रही,
तबियत हमारी दोनों की मुलाकात को खलती रही

एतबार किया था हमने उन पे रब की तरह जिंदगी में,
पर मोहतरमा खुद और खुदा को हर कदम छलती रही

दर्द नहीं था शमा को अपने जिस्म को जलाने का,
खुशी से औरों की राह रौशन करने जलती रही

तूफान आए तो सफर को रोकना ही होता है बेहतर,
पर भीड ना जाने क्यूँ मौत की तरफ ही चलती रही

ऐसा भी नहीं “कमल” कि कोशिश नहीं की मनाने की,
पर गलतफहमीयाँ उन के जहन में ना जाने क्यूँ पलती रही

©कमलेश रविशंकर रावल

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वो

उस का ही हूँ, पर वो गैर समझ रही है,
करता हूँ मोहब्बत पर वो बैर समझ रही है

निभाने साथ छोडा है मैंने अपना गुरुर
थामा है हाथ फिर भी वो पैर समझ रही है

चला हुँ साथ-साथ जिंदगी के सफ़र में,
पर इस सफ़र को वो सैर समझ रही है

लग चुकी है वहम की दीमक रिश्तों की जड़ों को,
नाजुक हालात को भी वो खैर समझ रही है

देता हूँ मशवरा मैं अक्सर आगे बढ़ने का,
कैसे समझाउँ? नादान है वो, ठैर समझ रही है

© कमलेश रविशंकर रावल

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आग

किस की निगाहों तले नफ़रत की आग पल रही है?
कोई तो बताओ मुझे दिल्ली क्यूँ जल रही है?

बोये थे जो बीज सियासतदानों ने वोट बटोरने,
दिलों के खेतों से कत्ल की फसल फल रही है

मिट रहा है अमन और भाईचारा हर शहर और गाँव से
बाशिंदों के जहन में शंका- कुशंका बल रही है,

हाँसिल ना होगा किसी को कुछ भी खूनखराबे से,
खामोखाँ मुल्क की शानौशौकत ही ढल रही है

उम्मीद किस से रखोगे इमान की “कमल” अब तुम
कानून की किताबें अब तो इंसाफ़ को छल रही हैं

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रूबरू

रूबरू ना मिलना हो तो ख्वाबों में ना आया करो,
रूलाना ही है हकीकत में, तो सपनों में ना हँसाया करो

रख नहीं सकते हिंमत जमाने में ईश्क के ऐलान की,
तो छुपछुप के हमें दिल में तुम यूँ ना बसाया करो

शमशेर की धार पे चल सकते हो तो ही प्यार की राह चुनो,
मुहब्बत को खेल बना कर नादानों को ना फसाया करो

मुल्क सिर्फ तेरा-मेरा ही नहीं देश के हर बाशिंदे का है,
सियासती मनसूबे पूरे करने गरीबों को ना सताया करो

यार मेरे हर मुश्किल का हल कोशिश से निकल आएगा ,
सहमे ना रहो, खुल के मन की बात “कमल” को बताया करो

© कमलेश रविशंकर रावल

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भीतर-बाहर

लिखते लिखते बहुत कुछ सीखता हुँ,
जो हुँ भीतर, बाहर भी वही
दिखता हुँ

उडने देता हूँ पंछीयों को आजा़द, नील गगन में,
घूसते हैं जब औरों के घौंसलों में लकीर तभी खींचता हुँ

गुलशन के गुलों को बरबाद होते हुए चुपचाप देख नहीं सकता,
पतझड और बहार में पानी सिर्फ मैं अकेला ही सींचता हुँ

आसाँ नहीं होता अपनी मुहब्बत को दूसरों को सौंप देना,
जिम्मेवारी और जज्बात के पहियों में रुह को पीसता हुँ

यूँ ही नहीं बस गया है “कमल” चाहने वालों के दिलों में,
खुद का अना कम करने,
इंसानियत के पत्थर पे घिसता हुँ

© कमलेश रविशंकर रावल

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चित्कार

भीतर चीखते मेरे अल्फाज़ सुन सको तो सूनो तुम!
रुह की खामोशीयों की चित्कार सुन सको तो सूनो तुम!

सिर्फ शोरबकोर नहीं ये नया इंकिलाबी ऐलान है,
अवाम की जोश लल्कार सुन सको तो सूनो तुम!

घुँघरुँ नहीं बाँधे है तमाशे और पेट के खातिर,
कँवारे अरमान की झनकार सुन सको तो सूनो तुम!

मायूस ना हो दोस्त किस्मत से मिली नाकामयाबीयों से,
हून्नर को मिला है पडकार, सून सको तो सूनो तुम

लिखता नहीं है “कमल” वाह-वाही लूटने किसी की,
रब ने बख्शे फनकार को सुन सको तो सूनो तुम!

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शज़र

ना कोई ठिकाना, ना कोई दर या कायमी घर चाहता हुँ

मुसाफिर हुँ जन्नत का,जमीं पे तो बस सफ़र चाहता हुँ

तमन्ना नहीं कि हर ख्वाहिश पूरी करने वाला दरख्त मिल जाए
कडी धूप में दे दे हर राही को सुकुन वो शजर चाहता हुँ

गुजारनी है जिंदगी मुजे़ खानाबदोश रह के यूँ ही,
फिर भी ना जात पात या मजह़ब पूछे ऐसा शहर चाहता हुँ

पता नहीं ताकते हैं लोग क्यूँ नफरत भरी निगाहों से परदेशी को,
सब के लिए अपनापन नज़र आए ऐसी मीठी नज़र चाहता हुँ

सूना है कि तबाह हो रहा है गुलशन सियासत की आग में,
इन्सानियत के सहरे को भी कर दे हरा-भरा ऐसी नहर चाहता हुँ

© कमलेश रविशंकर रावल

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